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दिल्ली आजकल ब्यूरो , दिल्ली
22 मई 2023

देश में अब नए सिरे से आदिवासी नीति तैयार करने की मांग उठने लगी है. विशाखापट्टनम में आयोजित अखिल भारतीय आदिवासी सम्मेलन का उद्धाटन करते हुए प्रसिद्ध आदिवासी लेखक और कार्यकर्ता डॉ वासवी किरो ने कार्यक्रम में आए प्रतिभागियों से नई आदिवासी नीति तैयार करने के लिए लड़ने की अपील की. उन्होंने कहा कि एक ऐसी नीति बनें , जो आदिवासी भाषाओं और संस्कृति के विकास को सुनिश्चित करें. उन्होंनेआदिवासी इतिहास अकादमी के निर्माण पर भी जोर दिया. किरो ने पारंपरिक जनजातीय चिकित्सा, व्यंजनों और अन्य ज्ञान के पहलुओं पर प्रकाश डाला.

झारखंड की रहने वाली डॉ वासवी किरो ने ‘ सोनोट जूआर ’ – प्रकृति जिंदाबाद के साथ प्रतिनिधियों का स्वागत किया. उन्होंने जब कहा कि ऊटी अबुवा, बीर आबुवा और दिसुम आबुवा (यह जमीन हमारी है, जंगल हमारा है और देश हमारा है), तो जवाब में जोरदार तालियां और ‘जय जौहर’ के नारे लगे.

किरो ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि आदिवासियों को अपने अधिकारों के लिए संगठित लड़ाई लड़नी चाहिए. कई गैर आदिवासियों, जो आदिवासियों के सच्चे मित्र हैं, ने उनके संघर्ष में बहुत योगदान दिया है. उन्होंने समझाया कि आरएसएस के नेतृत्व वाली ताकतें आदिवासियों को विभाजित कर रही हैं और उनकी एकता में दरारें पैदा कर रही हैं, तो वह जानती हैं कि ‘लाल सलाम’ की शपथ लेने वालों ने आदिवासी संघर्षों के लिए बहुत बलिदान दिया है.

अपने 42 मिनट के संबोधन में डॉ. किरो ने कहा कि दुनिया में 70 करोड़ से अधिक स्वदेशी लोग, यानी इंडीजिनस पीपुल, हैं, जिनमें से 20 करोड़ भारत में रहते हैं. औपनिवेशिक शासन के 75 साल बाद भी उनकी 7000 स्वदेशी संस्कृतियों की उपेक्षा और दमन किया गया है. भारत में 750 से अधिक आदिवासी जनजातियाँ हैं जिनमें से 75 सबसे अधिक असुरक्षित हैं. उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति बहुत गंभीर है.

डॉ किरो ने कहा कि भारत में राज्य की आदिवासी नीति, जो ‘विकास के नाम पर विस्थापन’ पर आधारित है. इस नीति ने आदिवासियों को बहुत पीड़ित किया हुआ है. यह जंगलों और प्राकृतिक संपदा की लूट, भूमि अलगाव, प्रकृति का क्षरण और उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों को लागू करने में अरुचि इसका कारण है. उन्होंने कहा कि भारत में विस्थापित हुए 10 करोड़ लोगों में से 80 फीसदी आदिवासी और स्वदेशी लोग हैं.

डॉ. किरो ने बताया कि आदिवासी लोग सरल और अज्ञानी होते हैं और वे अशिक्षा, पिछड़ेपन, कुपोषण और बीमारी से पीड़ित होते हैं. आदिवासी महिलाएं एनीमिया और निरक्षरता से अधिक पीड़ित हैं.
उन्होंने आदिवासियों के संसाधनों को निगमों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देने की कांग्रेस शासन काल की पुरानी नीतियों का पालन करने के लिए भाजपा सरकार की आलोचना की. उन्होंने कहा कि वन आदिवासियों की संपत्ति हैं, केवल उन्हें ही इसका उपयोग करने या देने का अधिकार होना चाहिए. विकास का मतलब यह होना चाहिए कि आदिवासी अपने संसाधनों का विकास करें और उनसे कमाई करें.निगमों को यह अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए.
स्वागत समिति के मानद अध्यक्ष, ईएएस सरमा ने कहा कि सरकार आदिवासियों पर बुलडोजर चला रही है, उनके अधिकारों पर हमला कर रही है. उन्होंने कहा कि यह अनिवार्य होना चाहिए कि उनसे संबंधित सभी मामलों में ग्राम सभाओं, जनजातीय परिषदों की अनुमति ली जाए. लेकिन यह सरकार इतनी जनविरोधी है कि यह राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से भी परामर्श नहीं करती है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपालों के पास आदिवासियों के पक्ष में और उनकी मदद करने वाले कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन वे इस शक्ति का उपयोग नहीं करते हैं.
इस अवसर पर एआईकेएमएस अध्यक्ष कॉम. वी वेंकटरमैया ने मंच से डॉ. वासवी किरो द्वारा लिखित पुस्तक ‘भारत की क्रांतिकारी आदिवासी औरतें’ का विमोचन किया.

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